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राजनीति का खेल

Posted On: 5 Feb, 2016 में

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भारत एक गणतंत्रात्मक देश है जहाँ की सत्ता राजनेताओं द्वारा संभाली जाती है,..भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जो सभी धर्मो का शरणदाता है लेकिन वर्तमान में राजनीति एक खेल बन गया है जहाँ देश को मैदान में खड़ा कर दिया जाता है और क्रम से प्रत्येक पार्टी द्वारा इसको खेल की तरह खेला जाता है। .वर्तमान में अरुणाचल प्रदेश का मुद्दा देश के लिए एक चिंताजनक विषय है लेकिन विपक्षी पार्टियो द्वारा केंद्र का साथ देने के बजाय इसका विरोध किया जा रहा है। वहां की वर्तमान िस्थति को देखते हुए राष्ट्रपति शासन लागु करना सहज प्रतीत होता है। संविधान के आर्टिकल 356 में राष्ट्रपति शासन लागु करने की िस्थति का उल्लेख किया गया है कि जिस राज्य में बाहरी आक्रमण की घटना हो या राज्य की सरकार में बहुमत ना हो तो उस राज्य में राष्ट्रपति शासन लागु किया जाता है। वहीँ संविधान के आर्टिकल 174 में उल्लेख किया गया है कि विधानसभा की बैठक के दो सत्र के बीच में छ महीने से ज्यादा का अंतर नहीं होना चाहिए। इस तरह अरुणांचल प्रदेश में सरकार के सक्रिय न रहने व चीन के सीमा विवाद को देखते हुए राष्ट्रपति शासन लागु किया गया है। लेकिन वहीँ कांग्रेस की सरकार द्वारा इसमें केंद्र को दोषी ठहराया गया है। इस तरह अगर देश के अंदर मतभेद की िस्थति रही तो पड़ोसी शत्रु देशों इस मतभेद का फायदा उठा सकते है।

वहीँ दूसरी तरफ राजनेताओ द्वारा सत्ता में आने के लिए आरक्षण के मुद्दे को आगे लाया जाता है। चुनाव के समय घोषणा की जाती है कि अगर हम सत्ता में आये तो आपको इतने प्रतिशत आरक्षण दिया जायेगा और आपको सामान्य वर्ग से ओबीसी में लिया जायेगा। जिसका नतीजा आप देख सकते है वर्तमान में आंध्र प्रदेश का कापू समुदाय द्वारा आरक्षण की मांग को लेकर किया जाने वाला आंदोलन। वहीँ राजस्थान में गुर्जर समाज द्वारा किया गया आंदोलन। लेकिन इन सब आंदोलनों के पीछे विपक्ष की पार्टी का मुख्य हाथ होता है। लेकिन ये एक चिंता का विषय है कि अगर इसी तरह मतभेद रहा तो एक समय देश आंतरिक मामलों को भी नहीं सुलझा पायेगा। बाबा अम्बेडकर द्वारा आरक्षण के लिए दी गयी अवधि का अब कोई महत्व नहीं रह गया है। सन १९५९ से लेकर २०११ तक पिछड़ी जाति और जनजाति द्वारा १स्त लेवल के कर्मचारी के चयन में ग्यारह प्रतिशत की वृद्धि हुई है। किसी ने सच कहा है कि गरीब की कोई जाति नहीं होती है। .गरीब का कोई धर्म नहीं होता है। जनाब गरीब गरीब ही होता है। वर्तमान में आरक्षण एक मज़ाक बन गया है। अगर इसी तरह प्रत्येक समुदाय व जाति द्वारा आरक्षण की मांग के लिए आंदोलन किया जाने लगा तो जाहिर सी बात है कि पुरे देश में हड़कम्प मच जायेगा। अब आरक्षण के मापदंड में संशोधन किया जाना चाहिए आरक्षण का आधार आर्थिक होना चाहिए। क्योकि पिछड़ी जाति या जनजाति का संम्पन परिवार का विद्यार्थी आरक्षण से किसी भी जॉब को पा सकता है। लेकिन सामान्य वर्ग में गरीब परिवार का विद्यार्थी इस आरक्षण के भेदभाव से पीछे रह जाता है और आत्महत्या तक करने को मजबूर हो जाता है। इसलिए सामान्य वर्ग के गरीब को आरक्षण ना मिलना उतना ही अनुचित है जितना कि पिछड़ी जाति व जनजाति के संम्पन वर्ग को मिलना।
हाँ एक और बात , अगर कोई स्टूडेंट किसी भी तरह की अनैतिक या असामाजिक क्रिया में शामिल होता है तो उस विश्वविद्यालय या स्कूल द्वारा उसके प्रति एक्शन लिया जाना आम बात है। लेकिन वहीँ राजनेताओ द्वारा उस विद्यार्थी के परिवार को सहानुभूति दर्शाना व संवेदना प्रकट करना चापलूची का अच्छा उदाहरण है।
राजनीतिक पार्टिया एक दूसरे पर कटाक्ष करती है। किसी भी विद्यार्थी द्वारा आत्महत्या करना व उसे विपक्ष की पार्टी द्वारा केंद्र सरकार को दोषी ठहराना , इन दोनों बातो में कोई सम्बन्ध नहीं दिखाई देता है। रोहित वेमुला के मामले को विपक्षी दलों द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर लाना व देश में अशांति फैलाना , ये देश के भविष्य के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। अगर कोई राजनीतिक पार्टी आंतकवाद के मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है तो उसे किसी अन्य मुद्दे को राष्ट्रीय मंच पर मज़ाक बनाने का कोई हक़ नहीं है। ये देश हम सबका है तथा इस देश की जय जयकार विदेशी धरती पर की जाती है। अतः अगर बुद्धिजीवी व राजनेता इस बात पर अमल करे तथा इस देश को किसी पार्टी विशेष का न माने तो आगामी भविष्य के लिए बेहतर होगा। हाल ही में हुए पठानकोठ आंतकी हमले को लेकर विपक्षी दल मौन धारण किये हुए है। जहाँ छ भारतीय जवान देश के लिए शहीद हो गए थे। लेकिन उसका किसी भी विपक्षी दल ने जिक्र नहीं किया और ना ही किसी को दोषी ठहराया। लेकिन एक दलित छात्र के आत्महत्या करने से देश में अफरा तफरी मचा दी।
किसी भी व्यक्ति द्वारा निजी मामलों से परेशान होकर आत्महत्या करना तथा उस आत्महत्या में उस विश्वविद्यालय को दोषी ठहरना कतई उचित नहीं है.. देश का अन्नदाता किसान जो सबका भरण पोषण करता है। उनके द्वारा गरीबी व कर्ज से आहत होकर हजारों की संख्या में आत्महत्या करना आम बात है जो किसी भी न्यूज़ की सुर्ख़ियों में नहीं आता है। अतः अगर बुद्धिजीवी व राजनेता इस बात पर अमल करे तथा इस देश को किसी पार्टी विशेष का न माने तो आगामी भविष्य के लिए बेहतर होगा।
अरे भाई उसने देश के लिए क्या किया कि आप उसे खोने से इतना कमजोर हो गए कि उस मुद्दे को इस कद्र फैला रहे हो। देश के एक जवान के शहीद होने पर कुछ नहीं और एक दलित के आत्महत्या करने से इतना कुछ हो गया..
अगर इस तरह देश में आंतरिक विरोध की बजाय शत्रु देशों का सामना किया जाए तो देश विकास की राह पर तीव्र प्रगति करेगा। लेकिन अगर इस तरह पग पग पर विपक्षी दल अपना हित साधने लगेंगे तो ये चिंताजनक है।

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